शीर्षक: खुद की पहचान
खुद ने खुद को, न पहचाना
दावा किया , दुनियाँ को जाना
मनवा, बड़ी अजीब बाते करता
दूसरों में , खुद को, ढूंढता रहता
साकार, अपने सपनें न कर पाता
गैरों के कर्म पर, तिरछी नजर डालता
जायज को पाने में, नाजायज अपनाता
गुनाह दूसरे का, नजर अंदाज न कर पाता
शीशे सी काया, कितना कुछ, उसमें समाया
मनवा, खुद तूँ सोच, क्यों मानव जीवन पाया ?
✍️ कमल भंसाली
-Kamal Bhansali