Bahadurshah zafar...
लगता नहीं है जी मेरा,
उजड़े दयार में!
किस की बनी है,
आलम-ए-नापायदार में!
बुलबुल को बागबां से,
न सय्याद से गिला!
किस्मत में क़ैद लिखी थी,
फसल-ए-बहार में!
कह दो इन हसरतों से,
कहीं और जा बसें!
इतनी जगह कहाँ है,
दिल-ए-दाग़दार में!
एक शाख़ गुल पे बैठ के,
बुलबुल है शादमान!
कांटे बिछा दिए हैं,
दिल-ए-लाल-ए-ज़ार में!
उम्र-ए-दराज़ माँग के,
लाये थे चार दिन!
दो आरज़ू में कट गये,
दो इन्तेज़ार में!
दिन ज़िन्दगी के ख़त्म हुए,
शाम हो गई!
फैला के पांव सोएंगे,
कुंज-ए-मज़ार में!
कितना है बदनसीब “ज़फर”,
दफ़्न के लिए!
दो गज़ ज़मीन भी न मिली,
कू-ए-यार में”