दूर तक देखने का मन करता है
जहाँ तुम खड़े हो,
हँसता, खिलखिलाता,मुस्कराता समय चल रहा हो,
जहाँ नदी कलकल करती
ऊँ नमः शिवाय कह जाती हो।
वहाँ तक जाने का मन करता है
जहाँ तुम बैठे हो,
हवा का शीतल,सरल झोंका हो,
पत्थरों पर कोमल कुछ सजा हो,
जैसे प्यार से गले में बँधा गुलोबंद।
शब्द बुनने का दिल करता है
जैसे बुनकर बुनते हैं साड़ियां,
और जो प्यार से पहुँच जाती हैं घर-घर।
* महेश रौतेला