"निकले हम कहाँ से
निकले हम कहाँ से और किधर निकले;
हर मोड़ पे चौंकाए ऐसा अपना सफ़र निकले;
तु समझाया किया रो-रो के अपनी बात;
तेरे हमदर्द भी लेकिन बड़े बे-असर निकले;
बरसों करते रहे उनके पैगाम का इंतजार;
जब आया वो तो उनके बेवफा होने की खबर निकले;
अब संभले के चले 'ज़हर' और सफ़र की सोच;
ऐसा ना हो कि फिर से ये जगह उसी का शहर निकले;
तु भी रखता इरादे ऊँचे तेरा भी कोई मक़ाम होता;
पर तेरी किस्मत की हमेशा हर बात पे मगर निकले। "
गुलज़ार साहेब की कलम से 🖋