दिनांक-03/05/2021
प्रस्तुति-कल्पना भट्ट
खुशहाली
इतराती इठलाती बलखाती तितली
घूमती-फिरती क्यारी-क्यारी
पलभर का जीवन होता उसका
पर मस्त रहती और उड़ती फिरती
पशु-पक्षी, फल-फूल सभी का
जीवन होता अनिश्चित देखो
बड़ी मछली छोटी को खाती
नियति भी तो यही सिखाती
नहीं होते प्राणी दुःखी
नहीं ऐसा होता सम्भव नहीं है लगता
पर प्रकृति के नियमों का
खुशहाली से पालन है होता
हाय तौबा बस हम ही मचाते
अक्ल होते हुए भी बेअक्ल से बनजाते
सारी दुखदायी घटनाओं से विचलित क्यों सिर्फ हम ही हो जाते
खुशहाली पशु-पक्षियों से सीखें
आओ प्राण-वायु से इसको सींचे
सबसे बेहतर ईश्वर ने जब बनाया है हमको
आओ मिलकर सब इसको गुने
जीवन-मृत्यु का खेल सभी का
फिर क्यों हम अपना ही दुःख देखें
आओ खुश हो ले हम भी
और जीवन-रूपी इस ऋण को जी ले।
खुशी बाटें खुशहाली बाटें
मिलकर बाटें दुखों को हर लें
धूप तो हर हाल में आएगी
आज नहीं तो कल आएगी
इस बात को समझें इस बात को जाने
फिर क्यों मन उद्वेग को सहजें
वो देखों वहाँ पेडों के पत्ते
हवा से करते कैसी हैं बातें
सुख और दुःख दो ही तो होते
तीसरा हम स्वयं ही फिरते है लादे
खुश हो तुम खुश हम भी हो ले
खुशहाली की चादर ओढ़े
चलो चले एक कारवाँ बना ले
और चले बस चलते जाएँ ।