प्यार कब शान्ति बन गया
पता ही नहीं चला,
प्यार की सब संवेदनाएं
कब ढीली हो गयीं
पता ही नहीं चला!
शब्दों का भार
कब समाप्त हुआ
पता ही नहीं चला।
कब प्यार, बड़ा हो गया
कब फूलों सा झड़ गया,
कब बोलना भारमुक्त हो गया
पता ही नहीं चला!
राहों की बनावट कब सरल हुयी
आना-जाना कब आदत बन गयी,
प्यार कब शान्ति में बदल गया
पता ही नहीं चला!
* महेश रौतेला