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मैंने आज़ादी की लड़ाई नहीं देखी, पर आज उसकी छवि देखी। कुछ ऐसी ही होगी वह जंग, जहाँ रक्षक ही भक्षक बनकर सामने खड़े होंगे; जहाँ बच्चे, बूढ़े, बड़े और जवान—सभी लड़ रहे होंगे, शांति पूर्वक आंदोलन कर रहे होंगे। इस आंदोलन में अनेक चेहरे होंगे—एक माँ, जिसका इकलौता बेटा इस व्यवस्था में पिस गया होगा; एक बाप, जो अपने बच्चे की लड़ाई लड़ने आया होगा; अनेक बच्चे, जो अपने भविष्य के लिए जुटे होंगे; और भी अनेक चेहरे, जो अपने दर्द को छिपाए उस भीड़ में खड़े होंगे। तभी दूर से धमकियों की आवाज़ आई होगी। डंडों, लाठियों और गैस के गोलों के चलने का आगाज़ हुआ होगा। पर आंदोलनकारियों ने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया होगा। उन्होंने सोचा होगा, "आख़िर ये भी तो हमारी तरह ही इंसान हैं। थोड़ी-बहुत इंसानियत तो इनमें भी बची होगी। कम-से-कम बच्चों, लड़कियों और छात्रों पर तो ये बल का प्रयोग नहीं करेंगे।" पर जब हैवानियत का वह रूप देखा, तो बची हुई उम्मीद भी टूटती हुई नज़र आई। जो लोग शिक्षा-व्यवस्था का स्वरूप बदलने निकले थे, वे खड़े हुए और बोले, "वाह, सर! क्या ख़ूब काम किया है। बच्चों, लड़कियों और छात्रों पर लाठियाँ बरसाकर, गैस के गोले चलवाकर उनका बुरा हाल कर दिया, और आप मुस्कुरा रहे हैं। चलिए, आज हमने भी तालियों से आपका सत्कार किया है।" जाते-जाते आपने हमारी इस जंग को और भी परिष्कृत कर दिया है।
क्या है दोस्ती ? किसी ने हमसे पूछा, क्या है दोस्ती ? हमने कहा उसे कभी न याद करना है दोस्ती। क्योंकि वो तो कभी भुलाया ही नहीं जाता। किसी ने हमसे पूछा, क्या है दोस्ती? हमने कहा उसके साथ एक ही टिफिन को शेयर करना है, दोस्ती। क्योंकि उसे खिलाए बिना हमसे खाया नहीं जाता।। किसी ने हमसे पूछा क्या है दोस्ती? हमने कहा उसके साथ एक ही बैंच पर बैठकर ,पढ़ना है दोस्ती। क्योंकि उसके बिना हमसे स्कूल जाया नहीं जाता।। किसी ने पूछा क्या है दोस्ती हमने कहा उसके साथ हरी घास पर बैठकर घंटों गप्पे लड़ाना है ,दोस्ती । क्योंकि उसे सुने बिना हमसे रहा नहीं जाता। किसी ने हमसे पूछा, "क्या है दोस्ती?" हमने कहा, "उसके साथ कितना भी झगड़ लें, आखिर में उसी के लिए लड़ना ही दोस्ती है।" क्योंकि जब बात दोस्त पर आती है, तो हमसे सहा नहीं जाता। क्या यही है दोस्ती? हाँ, यदि मैं कहूँ तो यही है दोस्ती राखी
लोग अभी बोल रहे हैं, खामोशी से सुन लेना तुम। जब तुम्हारा वक्त आए,जो भी दिल में हो सब कुछ कह देना तुम, कि कैसे तुमने चलना सीखा, गिर कर खुद संभलना सीखा...
जिंदगी लिख रही है ,कुछ नए गीत चलो गुन गुनाकर देखते हैं । मंजिल मिले या न मिले रास्ता तो आजमाकर देखते हैं।।
खामोशी को पन्नों पर उतार अपनी क़िस्मत को लिख रही थी ,में । एक नई मंजिल पर कदम रख अपनी कामयाबी की ओर बढ़ रही थी, में।।
' चलो कुछ नया बुनते हैं , न ' रिश्ता सिर्फ एक ही कंधे पर क्यों ?, दोनों मिलकर निभाते हैं न । , बोझ सिर्फ़ एक ही कंधे पर क्यों ?दोनों मिलकर उठाते हैं न।। अगर गलती हुई है तो, कलंक सिर्फ एक ही के माथे पर क्यों? दोनों मिलकर लगाते हैं न। सिर्फ़ भागी हुई लड़की ही क्यों? भागे हुए लड़के भी कहलवाते हैं न ।। परिवार की इज्ज़त बचाना सिर्फ़ एक ही के हाथ में क्यों?, दोनों साथ में बनाते हैं न । नियम सिर्फ़ एक पर ही लागू क्यों ?दोनों मिलकर निभाते हैं न।। यदि एक आगे बढ़ जाए तो घबराते क्यों हो ?, बस थोड़ा अना को परे रख, हाथ पकड़, क़दम क़दम मिलाकर साथ चलते हैं, न। पुराने सड़े गले धागों को धुल कर ,नए धागों को चुनते है, न। चलो कुछ नया बुनते है, न। राखी
क्या है कविता? क्या है कविता?, मैं यदि कहूं तो वह भावनाएं जो स्वयं से फूट कर आएं और शब्दों को इतना चमत्कृत बनाएं कि ,वह स्वयं कविता बन जाए। जिसमें किसी का रोष दिखे तो हो व्यंग्य भरा हास्य भी ,साथ में प्रेम भी हो,और ममता भरी करुणा। हो अतीत का चित्र और वर्तमान के लिए संदेश भी, साथ में भविष्य की उज्जवलता हो, नवांकुरो के लिए कामनाएं भी।। जिसमें समाज का कटु सत्य भी और राजनीति का झूठा मुखौटा,हो एकजुटता और मानवता का संदेश भी । क्या यही है कविता हां यदि मैं कहूं तो यही है कविता।। राखी
धीरे-धीरे गिरकर फिर संभल जाएंगे हम एक उम्मीद है , कि यह इम्तिहान भी पार कर जाएंगे हम आज चल रहे हैं ,तो क्या कल दौड़ कर भी दिखलाएंगे हम । धीरे-धीरे गिरकर फिर संभल जाएंगे हम उम्मीद है कि ,यह इम्तिहान भी पार कर जाएंगे हम । आज हारे हैं, तो क्या कल जीतकर भी दिखलाएंगे हम ।धीरे-धीरे गिरकर फिर संभल जाएंगे हम एक उम्मीद है ,कि यह इम्तिहान भी पार कर जाएंगे हम। आज गम हैं तो क्या कल खुशियों को भी लाएंगे हम धीरे-धीरे गिरकर फिर संभल जाएंगे हम एक उम्मीद है ,कि यह इम्तिहान भी पार कर जाएंगे हम। आज तन्हा हैं तो क्या कल मेफिलो में भी जाएंगे हम। धीरे धीरे गिरकर फिर संभल जाएंगे हम एक उम्मीद है कि ये इम्तिहान भी पार कर जाएंगे हम।
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