थके नहीं हैं हम अभी
विश्वास है जगा हुआ,
आस्था के वेग में
अडिग राह बनी हुयी।
पहाड़ उधर बन्धु है
आशा वहाँ चढ़ रही,
आलोक अभी दिख रहा
कदम निरन्तर बढ़ रहे।
हम श्मशान तो हैं नहीं
जो शव हम पर जल सकें,
हम चेतना के फूल हैं
जो हर बाग में खिल रहे।
दृष्टि हमारी बर्फ है
जो प्यार में पिघल रही,
थके नहीं हैं हम अभी
बस, साथ का विराम है।
* महेश रौतेला