आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा
वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा
इतना मानूस (आत्मिय) न हो
ख़िल्वत-ए-ग़म(अकेलापन) से अपनी
तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा
तुम सर-ए-राह-ए-वफ़ा देखते रह जाओगे
और वो बाम-ए-रफ़ाक़त(दोस्ती) से उतर जाएगा
किसी ख़ंजर किसी तलवार को तक्लीफ़ न दो
मरने वाला तो फ़क़त बात से मर जाएगा
ज़िन्दगी तेरी अता(अदा) है तो ये जानेवाला
तेरी बख़्शीश तेरी दहलीज़ पे धर जाएगा
डूबते-डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ
मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा
ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का "फ़राज़"
ज़ालिम अब के भी न रोएगा तो मर जाएगा
- अहमद फ़राज़ ।