Hindi Quote in Story by Shubham Rawat

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मैं हूँ जंगल। नि:स्वार्थ जंगल। मुझमें ना जाने कितने ही जीव-जन्तु रहते हैं। खरगोश, शेर, बाघ, लोमड़ी, हिरन, सुअर, सौल, भालू और भी ना जाने कितने जानवर मुझमे घर बनाये रहते हैं। कितनों जानवरों के नाम तो मैं खुद नहीं जानता। पिछले ही हप्ते एक मेरे दोस्त, जो खरगोश जाती का रहने वाला है। उसने दो नन्हें खरगोशों को जन्म दिया है। बड़े ही प्यारे बच्चे हैं। मैं जंगल; जिसमें जानवरों का घर हैं। जानवरों का परिवार हैं। जो मेरा परिवार हैं। हम बड़े ही प्यार से मिल जुल कर एक साथ रहते हैं। मैं जंगल जिसमें से ना जाने इंसान क्या-क्या अपनी जरूरतों की जिजें लेकर जाता हैं। ऐसा भी नहीं है कि; हमेसा इंसान मेरा नुकसान ही करता हैं। आज-कल तो इंसान बड़ा ही जागरुक हो रहा हैं। पेड़ काट रहा है तो पेड़ लगा भी रहा हैं। पर्यावरण को बजा रहा है। पर कुछ इंसान ना जाने इतने मूर्ख क्यों हैं। उन्हें कुछ बातें समझ में ही नहीं आती हैं। कल कुछ इंसान आये थे जंगल में। लकडियां काट के ले गये मुझसे। उससे मुझे कोई परेशानी नहीं थी। दिक्कत तो तब हो गयी, जब वो इंसान घर को लोटते हुए मुझमे आग लगा गये। आग लगाकर वो इंसान तो घर को चले गये। सारी परेशानी मुझे हुई। परेशानी तो नहीं कह सकता हूँ। सारा दु:ख मुझे ही हुआ। मुझमे आग अपने-आप थोड़े ही लग जाती हैं। कुछ दो-चार मुर्ख इंसान ही तो है, जो मुझमें आग लगा जाते हैं। प्रदूषण-प्रदूषण कहते रहते हैं। और जंगल में आग लगा जाते हैं। आग लगाकर वो इंसान तो चले गये। आग ने पूरा जंगल जला डाला। मैंने बताया था, वो दो खरगोश के नन्हें बच्चे वो भी आग में झूलस गये।

Hindi Story by Shubham Rawat : 111629082
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