वो जो इक इल्ज़ाम था उस पर कहीं...
आ न जाए अब हमारे सर कहीं...
जिस की ख़ातिर क़ाफ़िला रोका गया...
वो मुसाफ़िर चल दिया उठ कर कहीं...
ख़्वाहिशों के ग़ार का मुँह बंद है...
तुम हटा देना न वो पत्थर कहीं...
दिल की इक उम्मीद दिल में रह गई...
इक दिया सा बुझ गया जल कर कहीं...
लापता है एक समुंदर आज तक..
झाँक बैठा था मेरे अंदर कहीं...
डस न ले मुझ को कहीं ख़ुशबू तेरी...
खा न जाए मुझ को ये बिस्तर कहीं...
आ गया वो जिस्म के मलबे तले...
मैं गिरा दहलीज़ से बाहर कहीं...
धूप के लम्बे सफ़र के ब'अद हम...
साँस लेंगे साए में रुक कर कहीं...