भीम कविता
पड़े थे हम उस गलत फेमियो में
तभी तो रह गई पीछे हर सदियो में
पता नहीं कहा से मिला था ओ धर्म
जिनकी जातीय व्यवस्था ने कभी ना दिया सही जीवन
कही ओ की जान चली गई थी ईश धर्म के पीछे
पर न कभी समझ पाया समाज ईश ढोंगी धर्म को
तभी तो एक " महानायक " ने बताए थी सही राह
और बौद्घ मय से सहारा था ए जीवन
दे गया दिन का सुख और रात की चेंन
ओ एक ही तो था जो " भीम " कहेलाया
पर कभी कभी ख्याल आता है की कब
ईश पिछड़ों की विचारधारा में परिवर्तन होगा
न जाने भारत कब बौद्घ मय होगा....???
__ Makwana jaydeep