"नही दो साख पेड़ों की, कि रहते हम हवा मे हैं,
मोहहब्बत से गिला कैसा, हमारे मन तरंग मे है |
कही ठहराव जो लाये, मोहब्बत वो नही होती,
सिमटती और ठहरे न ,जबानत भी नही होती |
कही जो सीख जाये वो मुहब्बत कह नही सकते,
यही वो सब्र आलम है जिसे हम सह नही सकते |"
मौलिक