# कर्म
झाँकते हैं कर्म सबके ही मनों से
और फिर दुश्वारियाँ बढ़ती ही जातीं
आज का जो दौर है ओ! मित्र सुन ले
खोलता है सबके जीवन की कहानी --
धुंध बढ़ती जा रही गहराइयों सी
मेघ मन में घुमड़ते पर न बरसते
सृष्टि का आलम ज़रा तो देख लें हम
संगदिल है अब यहाँ की ऋतु सुहानी --
द्वार पर तोरण नहीं परछाइयाँ हैं
और पीड़ा है ,यहाँ तन्हाइयाँ हैं
साँकलें तो बंद हैं ,कैसे खुलेंगी
हो नहीं जाएगी जब तक पीर पानी --
अहं के फैले दरीचे ,मन हुआ पाषाण सा है
सोच में कंटक भरे हैं मन यहाँ विकराल सा है
मार्ग हर दिल का कठिन ,सुनसान गलियाँ
कर्म कर लें ऐसे कुछ जो ,बन सके ये रुत सुहानी ---| |
डॉ. प्रणव भारती