बूढ़ी काकी
दाई,जो मुहल्ले में चाय पीने के लिए हर सुबह आती है।और जब दिख जाएं तब कहती है, "गोड़ धरत हई भईया"।उनका मुझे या किसी भी भईया को प्रणाम करना अखरता है।एक दिन उनसे पूछा कि तू काहे प्रणाम करलू?वह बोलीं, कि "अगर न धरब त हमके चाय के पियाई"।
दाई से जब तक बन पड़ा तब तक वो घरों में बर्तन धोना और गोबर फेका करती थीं,जिसके एवज में उन्हें रुपए,सुबह का नाश्ता और खाना मिला करता था।अब उनकी उम्र हो चली है,अब उनसे काम नहीं होता।फिर भी जिस घर में काम करती थीं,वहां अब भी सुबह का चाय और नाश्ता मिल जाता है,लेकिन दोपहर का खाना उसके घर में ही होता है,लेकिन अब सुबह में कई घरों में जाकर चाय पीती है,कहती है चाय से दर्द नहीं पता चलता।अब हर सुबह चाय पीने को मिले न मिले,लेकिन अपमान हर सुबह मिलता है,ख़ैर वह आज फिर आईं थी,चाय पीने,और एक पुराने बाहर रखे कप को साफ कर रही थी,फिर तलाश थी एक चाय की।