वोह अधिकार की बात नहीं करेगी
थोड़ा सा प्यार उसके झोली मैं डाल दो...
वोह अभिमान भी नहीं करेगी
उसकी नादानी को हंस के टाल दो......
परंपरा, अनुशासन, संस्कार, मान मर्यादा
शब्दों से परिचित है वोह
जानती है अपनी लखमन रेखा को...।.
पिंजरे मैं ना क़ैद करो उसकी अरमानो को
रस्मो, रिवाज़ों की बेड़ियाँ से ना जकड़ो उसके पैरों को
जी भर के उसको जी लेने दो
अलग पहचान बना लेने दो
तुम्हारा आधा हिस्सा है वोह
उसके हिस्से की सम्मान उसे दो......