देह से आगे बढ़ ,
मेरे अस्तित्व का दर्शन कर ।
केवल कामिनी ही नहीं ,
मैं जन्मदात्री भी हूँ ,
मेरे मातृत्व का दर्शन कर ।।
देह से आगे बढ़ ...
गर्भ में तेरा भार वहन कर ,
स्वरक्त से करती हूँ पोषण
छद्म शास्त्र रचकर तूने
हर युग में किया मेरा शोषण
छोड़ दनुजता , कपट-आचरण ,
है त्याग-प्रेम तेरा आभूषण
तू जड़ , मैं प्रकृति हूँ ,
मेरे देवत्व का दर्शन कर ।
देह से आगे बढ़ ,
मेरे अस्तित्व का दर्शन कर ।।
मेरा ही लहू दूध बना था ,
उसको पीकर पुष्ट हुआ तू
तेरा जीवन सरस है मुझसे ,
क्यों मेरे प्रति दुष्ट हुआ तू ?
माँ , पत्नी और बेटी पाकर ,
हर पन में संतुष्ट हुआ तू
प्राणों में रस भर तुझको
मैं नित नवजीवन देती हूँ
मेरे स्वामित्व का दर्शन कर ।
देह से आगे बढ़ ,
मेरे अस्तित्व का दर्शन कर ।।
हम दोनों सहगामी हैं ,
कल्याण समर्पण में है
तू क्या है ? क्या चाहता है ?
प्रतिबिम्ब मेरे मन-दर्पण में है
तुझको आनंद विध्वंस में है ,
मुझको आनंद सृजन में है
तेरी हृदय-वीणा झंकृत कर ,
मैं ही तुझे मनुष्य बनाती हूँ
मेरे कर्तृत्व का दर्शन कर ।
देह से आगे बढ़ ,
मेरे अस्तित्व का दर्शन कर ।।
नादान समझ और देखके चल ,
कहीं ठोकर खाकर गिर जाएगा
जब चिड़िया दाना चुग जाएगी ,
तब सिर धुनकर पछताएगा
तुझे मैं हर मोड़ पे राह दिखाती हूँ ,
मेरे नेतृत्व का दर्शन कर ।
देह से आगे बढ़ ,
मेरे अस्तित्व का दर्शन कर ।।
केवल कामिनी ही नहीं ,
मैं जन्मदात्री भी हूँ ,
मेरे मातृत्व का दर्शन कर ।।