एक दिल कई अरमाँ
जैसे खुला आसमाँ
हर डगर,पर मगर
मिले चाहत के निशां
कभी जुगनू बनके, कभी खुशबू बनके
परे जाती है तू क्यु रुबरु मिलके
सुन बेखबर,तेरे बिन मगर
अधूरी है दास्तां
एक दिल कई अरमाँ
जैसे खुला आसमाँ
चाँद मे तुझको देखु,चांदनी मे तुझको देखु
पागल इस नजर को कैसे भला अब रोकू
हर पहर,आए तू नजर
देखु जँहा जँहा
एक दिल कई अरमाँ
जैसे खुला आसमाँ
Sagar...✍️
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