कितने ही अरमान
कितनी ही आशाएं
कितने ही भरोसे
कितने ही इरादे
कितने ही वादे खुद से
जो पनपते रहे भीतर
मासूम और नन्हें से
कत्ल हो जाते हैं
हमारे ही भीतर उगे
अकेलेपन और बेरूख़ी के
खंजरों से अक्सर
क्या न्याय हो पाता है
क्या न्याय मिल पाता है
इन्हें यूं ही अधूरे मर जाने पर
मार दिए जाने पर
ये सारी ख्वाहिशें
दफ़न हो जाती हैं
भीतर ही चुपचाप
और
उग आती हैं फ़िर
कुछ नई ख्वाहिशें
मासूम और नन्हीं सी ...
:- भुवन पांडे
#न्याय