बहुत भावनाएँ भरी है गरीबो के प्रति तो !
केवल शब्दो के बीज ही न बोयें ,क्या होगा !
इन शब्दो से जो उनकी ,पीड़ायें गाये |
थोड़ा निकलिये ,बाहर चलिए ,
धूप ,धूल मिट्टी से मिलिये ,
जिनके बीच वो रहते है,
जितना हो सक्षम ,उतना ही करिये,
पर शब्द न केवल गढ़ते रहिए,
किसने मना किया है तुमको ,
हाथ बढ़ा न आगे बढ़िये,
बैठे- बैठे दोसी ढूंढें , दोषो मे शब्द ही गढ़ते रहिये
क्या शब्दो से पीड़ा हल, होयेगी |
गरीबी इनसे(शब्दो) रोटी पोयेगी?
क्या सुकून मिल पायेगा ,
जब इन्हे बिछा(शब्द) सो जायेगा|
शब्दो के हार से कुछ न होता , कब्र नही वह जीवन |
इन शब्दो को खुद मे लाये, ढोल पीट न बहलाये|
कर्मो से पीड़ा मिटा करे , मन बुद्धि संग जब जुट जाये|