टूटे पत्ते भी अपनी उम्र बया करते है
बरसती बूंदे भी अपना दर्द बयां करती है
लम्बी सड़के भी अपनी तन्हाई को रखती है-Shweta
अँधेरी रातें भी ख़ामोशी की चीत्कार बयां करती है
चलती हवाएं भी अकेलेपन का फरमान करती है
बस मानव ही वो है जो चह कर भी सब कुछ बयां नहीं कर सकता