किसे मानूं किसे न मानूं संशय में है मन मेरा, कहां गई वह ईश्वर शक्ति, जिस पर है विश्वास.।. तेरा मेरा।.।।
बेगुनाहों की मृत्यु आश्रय यही दिखाती है, शायद नहीं है परमेश्वर, हमको यह बताती है,--- बेगुनाहों की मौत, जो थे,, संत परम... और ज्ञानी ...। मृत्यु उन पर अधिकार जमा बैठी कहां है अंतर्यामी...। कैसे मान लूं मैं, हमें पालता है जग स्वामी..। बेगुनाह क्यों मर रहे कहां है अंतर्यामी? दान दिया हर कर्म किया, उचित जो समाज ने ठानी. शायद माना पत्थर को ईश्वर हमने और माना जग का स्वामी..। बेगुनाहों को फिर क्यों सजा मिली मौत की कहां है अंतर्यामी...?4----
टीटू त्यागी