तुम्हारे अद्भुत अनुराग की साक्षी हूँ मैं,
कई –कई रूपों में,
स्नेह रस में भीगती, डूबती !!
किन्तु ऐसा क्यों लगता है,
अभी कुछ और पाना है I
स्नेह का वो कौन सा स्वरुप है,
जिसमें तुम नर के स्नेही हठ का मान रखने के लिए,
अपनी प्रतिज्ञा भी तोड़ देते हो !!
उठा लेते हो शस्त्र, जबकि
तुम्हें उसका प्रयोग करना ही नहीं था !!
वो कौन सा बंधन है,
जो नारायण को नर के लिए,
अश्रु बहाने को विवश करता है !!
वो कौन सा सम्मोहन है,
जो नारायण को नर के सामने ,
हाथ जोड़ प्रणाम करने को विवश करता है !!
माधव ये कोई संशय नहीं,
भ्रम या ईर्ष्या भी नहीं,
बस तुम्हें जितना अभी तक जानती हूँ,
उससे तनिक और जानने की अभिलाषा है I
तुम्हारे जितना निकट हूँ,
उससे तनिक और निकट आना चाहती हूँ I
अपने अद्भुत स्नेह के इस पक्ष से
मुझे आलोकित करोगे ना?
#कृष्ण