चल पड़ा है तू जो बंदे अनंत की तलाश में
तू कहीं न खो जाए कि आनंद की तलाश में ।
अंतहीन राह है कामना अपार है,
विलासिता की चाह है स्वार्थ बेहिसाब है।
स्वयं की ही बात हो चाहे कोई न साथ हो
चल पड़ा है तू जो बंदे अनंत की तलाश में
तू कहीं न खो जाए आनंद की तलाश।
अर्थ तो तू पाएगा, पर अर्थ रह न जाएगा,
स्वर्ण तो मिल ही जाएगा,पर बड़ा सताएगा।
मरीचिका ये स्वार्थ की,किस ओर लेके जाएगी,
चल पड़ा है तू जो बंदे अनंत की तलाश में,