छद्म नारीवाद
स्त्री सत्ता की कट्टर समर्थक लेखिका अपने पिता और भाई के सम्मुख बैठी है..
पिता : मैंने तुम्हारे और विकास के बीच कभी कोई भेदभाव नहीं किया, जहां तक मुझे ध्यान है.. इसकी तुलना में तुम्हें ज्यादा लाड़ - प्यार दिया गया। तुम्हारी हर सही-गलत जिद को मैंने पूरा किया, फिर तुम हमेशा पुरुष सत्ता के खिलाफ झंडे तानकर क्यों चलती रहती हो । तुम्हें देखकर ऐसा लगता है, जैसे हमने तुम्हारे साथ सदा अन्याय किया है।
बेटी : नहीं पापा, मुझे आपकी परवरिश से कोई शिकायत नहीं है। मैं जानती हूं, विकास से मुझे हमेशा ज्यादा प्यार मिला। लेकिन इसके साथ ही एक सच्चाई और है कि मैं आपके लाड़-प्यार में नकचढ़ी बन गई। मैंने अपनी पसंद का पति ढूंढ़ा। आपने शादी के लिए सहमति भी दे दी, लेकिन मेरा पति मेरा गुलाम नहीं बन सका। मुझे तो शुरू से ही अपनी बात मनवाने की आदत थी, चाहे वह बात सही हो या गलत। मेरी यही कुंठा मेरी लेखनी में झलकती है, खैर आप चिंता मत कीजिए। अब मैं इस दिशा में आगे बढ़ गई हूं तो कोशिश रहेगी खूब आगे बढ़ूं। चाहे मुझे पुरुष सत्ता के खिलाफ जितनी नफरत उगलनी पड़े और आप तो शुरू से ही चाहते थे कि आपकी बेटी जिस क्षेत्र में भी, बढ़े खूब सफल हो।
यह कहते हुए उसने अपने पापा के गले से लग कर जोरदार ठहाका लगाया।
मीनाक्षी सिंह