My New Poem...!!!!
तबियत उचाट है दिल ग़मज़दा
न काम है न काज है आजकल
बंदा परेशान है वक़्त ख़ौफ़ज़दा
दूआएँ भी तो बेअसर है आजकल
जहाँ सुनसान है पर कर्म है बाँ-वफ़ा
सजदे सर हर बंदा झुका आजकल
गुलाब की पत्तियाँ भी काट सकती
सख़्त हीरो का जिगर,यक़ीन अगर
मुकम्मल हो तो हर अंधेरी रात के
बाद सुबह पोह फटतीं है आजकल
दर्दनाक ख़ौफ़नाक ख़तरनाक घटा
है पर वफ़ा दुआओं में है आजकल
बंदा प़शेमान-ओ-प्रायश्चित करता
है करनी से अपनी शर्मिंदा आजकल
प्रभुजी माना ग़लतियों का अंबार है
बंदे पर शर्मसार करनी पर आजकल
बख्श दे बख्श दे बख्श दे पालनहार
तूं ही कृपालु-दयालु तारएाहार आजकल
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