Quotes by Chandervidya urf Rinki in Bitesapp read free

Chandervidya urf Rinki

Chandervidya urf Rinki

@chandervidya


एक ऐसी ऊंचाई,
जहां से दुनिया तो दिखे,
मगर दुनिया मुझे न देख पाए।

एक ऐसी भीड़,
जहां मैं मौजूद भी रहूं
और अनुपस्थित भी।

एक ऐसी धुंधली खिड़की,
जहां से शहर साफ़ दिखे,
मगर मेरी परछाईं
किसी को न मिले।

एक ऐसा मंच,
जिसकी रोशनी में मैं बोलती रहूं,
पर दर्शकों की आंखें
मुझ तक आने से पहले ही बुझ जाएं।

दुनिया रहे,
मगर उसका शोर
मेरे भीतर घर न बना पाए।
—# चंद्रविद्या उर्फ़ रिंकी

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कविता

एक लट जो बिखर जाती है तुम्हारे ललाट पर,
पानी से भीगे तुम्हारे मस्तक पर कुछ बूंदें मोतियों-सी दमकतीं।

अधरों पर अनायास ही कुछ शब्द लपके,
मगर फिर खुलकर चुप हो गए।
मुझे लगा तुम कुछ कहोगी,
मगर शब्दों की पहली आहट भीतर ही रह गई।

तुम कह नहीं पाती हो,
लेकिन मैंने देखा है तुम्हारी आँखों का कहना,
और सीख लिया है उनमें बह जाना।
सच कहूँ तो सीखा नहीं,
मगर जब डूब जाता हूँ और हाथ-पाँव चलाता हूँ,
तो तैरते हुए तुम्हारी आँखों से दिल को समझने की कोशिश करता हूँ।

मुझे लगा था—स्त्रियाँ उलझी होती हैं,
मगर तुम भावुक हो और मासूम।
कठोर हो सुरक्षा के लिए,
कोमल हो ममता से भरी।

तुम्हारे भीतर है प्यार सबके लिए,
इसलिए समझ पाना तुम्हें शायद मुश्किल रहा
मगर आसान तो कुछ भी नहीं।

तुम बहल जाती हो मीठी दो-टूक बातों से,
समेट लेती हो, संवार लेती हो हर काम इन दो हाथों से।
पल्लुओं में संसार समेटे, मोह-पाश का आधार समेटे

तुम चल देती हो एक मुस्कान लिए,
मैंने लाखों हृदय थाम लिए।

#स्त्रीएवंस्त्रीत्व #अनकही_सी_बात ✍️चंद्रविद्या उर्फ रिंकी

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कितना निश्चल, निर्मल है,
कल-कल बहता तेरा जल।
इन पत्थरीले पथ पर तुम,
कैसे चलती कोमल तल।
बहती जाती, बढ़ती जाती,
दुग्ध मेखला-से वस्त्र तुम्हारे,
कितने सुंदर अस्त्र तुम्हारे,
रक्त प्रवाह-सी नस-नस में तुम।
सह लेती हँस-हँस कर तुम,
हर बाधा को अपनाती हो;
तन यौवन की देहरी पर,
मन तेरा अब भी बालक ।
चंचल, चतुर, खेल-खेल में,
चुपके से भर देती बादल।
कभी धरा पर आने को,
होती कितनी व्याकुल तुम;
अनजाने में घर-आँगन,
खलिहानों में भर देती जल।
#चंद्रविद्या #अविरल प्रवाह #जीवन धारा

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