ये जमी मेरी मेरा आसमाँ,, बड़ा खूबसूरत है जहाँ
मेरी जिंदगी परवाज़ है, वो फ़िज़ा मेरी मैं उडू जहाँ
कभी धूप लेप के आसमाँ, हमने सुनहरे कर दिया
फिर धूप बांध के पाँव में, हम उड़े है ठंडी हवा ओ में
कभी वख्त उठा के सरो पे हम, और आग लेके परो पे हम
कभी चाँद खाली खुला कही, हम उड़े जहा पे हवा नई
~ गुलजार to A. P. J. अब्दुल कलाम
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