इस आग को ले जाना है
यह आग रामयण की हो,
या महाभारत की हो
इस युगों पुरानी आग को सबको तापना है।
जगत जननी सीता पृथ्वी से आ
पृथ्वी में समा गयी थी,
द्रौपदी आग से निकली थी
हिमालय तक चली थी,
इस आग को सुरक्षित रखना है।
मनुष्य आता-जाता रहता है
उसकी राख में जो आग होती है
वह बुझती नहीं है,
युगों तक बची इस आग को
प्रज्वलित करते रहना है।
*महेश रौतेला