कभी-कभी परिस्थिति ऐसी आती है कि आप बहुत कुछ कहना चाहते हैं। आपको बहुत घुटन महसूस होती है, लगता है जैसे सब कुछ ख़त्म हो चुका है।
बोलते वक़्त आपका गला भर जाता है, आवाज़ रुंध जाती है, आप रोने के काफ़ी करीब होते हैं, हिचकियाँ आवाज़ का दम घोंटने लगती हैं.. और फिर जब आप कुछ नहीं कह पाते तो खामोश हो जाते हैं। लगता है जैसे आपको सुनने वाला कोई नहीं है, या शायद आपको कोई समझ नहीं पाएगा, क्योंकि आप शायद इतने दुःखी हैं कि आपके पास वो शब्द ही नहीं जो आपकी बातों को सामने वाले तक पहुंचा सकें।
डर तो ये भी होता है कि सामने वाला आपको समझेगा नहीं बल्कि अनुमान लगा लेगा, सही और ग़लत में तौलने लगेगा। और शायद ये भरोसा भी नहीं रहता है कि आपकी कही बातें वो अपने तक रखेगा।
कभी कभी केवल खामोश सहारे की ज़रूरत होती है। जो आपको बिना पूर्वानुमान किए सुने, जो कोशिश करे आपकी मनोदशा समझने की।
आप मुझे जानते हों, या नहीं जानते हों। मुझसे मिले हों, या नहीं मिले हों। मुझे देखा हो, या नहीं देखा हो। मेरा आपसे रिश्ता हो, या नहीं हो। इन सभी बातों को परे हटाकर, जीवन में यदि आपको कभी भी, किसी भी वक़्त, अपने दिल की बात, चिंता, समस्या, उलझन, अंतर्द्वंद, या निराशा साझा करना हो.. तो आप बेझिझक मुझसे कह सकते हैं।
हो सकता है मेरे पास सुझाव ना हो, मगर मैं सब कुछ सुरक्षित रख, सुन सकती हूँ.. बिना किसी तरह की परिभाषा बनाए या अनुमान लगाए।
🙏
(केवल लिखने के लिए नहीं लिखा)
#रूपकीबातें