सुदंर कविता ..
गद्दे बिछाने में पुरी रात चली गयी ।
सोने का जब मौका मिला सुबह हो गयी ।।
चाह पुरी न हो सकी उम्र चली गयी ।
खुशियाँ धर आई तो जान चली गयी ।।
भक्ति न की प्रभु की जिदंगी चली गयी ।
मौत आई सर पे , अफसोस रह गयी ।।
बच्चो की देखभाल मे ,आयु चली गयी ।
लाठी की जब जरुरत हुई ,लडके की आस ,
चली गयी ।।
नजरें सुदंर सी थी तो ,सुदंरता निहारने में ,
चली गयी ।
प्रभु के दशर्न का समय हुआ ,तो नजरें ,
कमजोर हो गयी ।।
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