बरक़त - लघुकथा -----
सासुजी के देहांत के पश्चात सुधा के ससुर जी गाँव से शहर आ गये थे। उनके आने से सुधा की गृहस्थी तितर बितर हो रही थी। बात बात पर ससुर जी का हस्तक्षेप सुधा को अखरता था। उसने एक दो बार सुरेंद्र से भी इस मामले में चर्चा की लेकिन उसका रवैया बिलकुल तटस्थ था। क्योंकि उसे अपने पिता की सीरत का पूरा ज्ञान था। वे अनुशासन और संस्कार के कट्ट्रर पक्षधर थे।
आज तो उन्होंने हद ही कर दी। उधर सुधा भी आर पार की स्थिति में आ गयी। बात थी तो मामूली लेकिन दोनों की ज़िद के कारण टकराव के चरम पर जा पहुंची।
ससुर जी ज़मीन पर चटाई बिछाकर भोजन कर रहे थे। उसी समय दीनू माली बगीचे और लॉन की साफ सफाई और निराई गुड़ाई कर के जाने की इजाजत लेने आ गया। यह सब जिम्मेवारी आजकल ससुर जी ही देख रहे थे। चूँकि ससुर जी खाना खा रहे थे तो उन्होंने दीनू को भी खाने के लिये कह दिया और अपने पास चटाई पर बिठा लिया। फिर सुधा को आवाज़ दी कि बहू एक थाली दीनू के लिये भी लगा दो। सुधा यह सुनकर तिलमिला गयी।
"बाबूजी,किचन में सब धो पोंछ कर रख दिया।"
"दो मिनट लगते हैं, फिर धो लेना।"
"बाबूजी, आटा भी गूंथना पड़ेगा।"
"बहू, ये कैसे सवाल जवाब कर रही हो? क्या हमारे कहने का कोई मान सम्मान नहीं है? एक आदमी को खाना खिलाने की भी हमारी हैसियत नहीं है।"
"बाबूजी, आप बात का बतंगड़ बना रहे हैं।"
"बहू, तुम्हें याद है, गाँव में खाने के वक्त कोई आता था तो तुम्हारी सासु उसे बिना खाना खाये नहीं जाने देती थीं।"
"बाबू जी, गाँव में सब सामान घर के खेत खलिहान में ही होता है। यह शहर है, यहाँ सब कुछ खरीदना पड़ता है।"
ससुर बहू की नोंकझोंक बढ़ती देख दीनू चुपचाप खिसक लिया।
ससुर जी ने गुस्से से माथा पीट लिया।
"बहू,खाना खाते समय कोई भी आ जाये और उसे खाना खिला दो तो उससे कंगाली नहीं आती बल्कि बरक़त होती है।"
मौलिक लघुकथा