कभी-कभी मन को खोल दिया करो,
पहाड़ों की तरफ,
नदियों की धाराओं की ओर
उड़ते पंछियों के पीछे।
बेतरतीब होने दो उसे
खटखटाने दो दो चार दरवाजे
खोलने दो बंद खिड़कियों को
पढ़ना चाहता है तो पढ़ने दो।
कभी-कभी मन को खोल दिया करो,
प्यार की दिशा में
स्वतंत्र देशों की तरफ
शक्तिशाली शब्दों के पीछे।
जब लौटकर आयेगा
तो तुम्हारे पास आयेगा,
नयी आवोहवा ला
नवीनता में सराबोर,
वह दौड़ना चाहता है तो दौड़ने दो।
*महेश रौतेला