बिना दृष्टि के शून्य है......
बिना दृष्टि के शून्य है, लेखन का संसार।
चाहे जितना भी रचोे, पुस्तक का भंडार।।
सही राह हो सृजन में, गहराई भरपूर।
पाठक श्रोता के लिये, तब आँखों का नूर।।
दिशा हीनता रोकता, सद्गुणयुक्त स्वभाव।
संवेदित मन हो सदा, सृजन धर्मिता भाव।।
भावों की अभिव्यंजना, शब्दों का भंडार।
सृजनशीलता दमकती, आता तभी निखार।।
मौलिकता कृतिकार को, दिलवाती पहचान।
पाठक के दिल में पहुँच, तब पाता सम्मान।।
सब लोगों का हित निहित,समाजिक सरोकार।
सृजन तभी उत्कृष्ट है, व्यापक क्षितिजाकार।।
मानवता के हितों का, सदा रखे जो ध्यान।
निज स्वारथ को छोड़ दे, लेखक वही महान।।
उसका तो बस लक्ष्य हो, विसंगतियाँ अन्याय।
कलम सिपाही बन लड़े, मिले सभी को न्याय।।
सही दिशा पर ही बढ़ें, कवि समाज का संत।
उत्साही अभिव्यक्ति हो, निरुत्साह का अंत।।
मनोज कुमार शुक्ल "मनोज "