उस रात की बारिश आज भी मुझे याद आती है |
भीगे बदन मे कितनी खूबसूरत लग रही थी तुम |
मे भी कम भीगा नहीं था..
फिर तुमने अपने गीले बाल खुले किये..
उन बालों से टपकती और तुम्हारे गालों
से होकर गिरती बारिश की बूंदे
मोतियों से कम नही थी |
तुम खुदको सवार रही थी की,
तुम्हारी नजर मेरी तरफ गयी|
शर्माकर तुमने चेहरा ढक लिया था|
इस मौसम में ये सोने पे सुहागा था..
तेरा ठंडसे कापना.. क्यूंकि एक
मेरे अलावा तुम्हारे पास कोई
विकल्प नहीं था..
चाय को वक़्त लग जाता..
कम्बल समय पे न मिल पाता..
और तुम्हे 'पीना' नहीं भाता..
अगर नयी मुलाकात होती..
या शादी की पहली रात होती..
तो बात कुछ ख़ास होती..
फिर भी वह रात अभी याद आती है..
बारिश और तुम्हारा नाता बहोत
गहरा और पुराना है..
लेकिन मौके भी तो कम आये है...
जो भी आये तुमने खूब साथ दिया|
उम्र एहसास होने नहीं दिया|