#काव्योत्सव २.० #हास्य
जिसे हमने मुंह से लगाया
जाम समझकर
उस सिगरेट ने हमें चूस लिया आम समझकर
किसी ने हमें टोका
पीने से हमें रोका
उसकी बात ना सुनी हमने
इलज़ाम समझकर
टोकना भी उसने छोड़ दिया
बीती हुई शाम समझकर
जेबों में दी जगह हमने
उसे गुलफाम समझकर
जकड़ लिया उसने हमें
कतलेआम समझकर
गुमठियों पर हम जाते थे
चारों धाम समझकर
खरीदते थे पूरा पैकेट
इंतेज़ाम समझकर
जिसे हमने मुंह से लगाया
जाम समझकर
उस सिगरेट ने हमें चूस लिया
आम समझकर।