#काव्योत्सव #प्रेम
खयालों में मेरे, तुम छाए हो रहते
मेरे गीतों में तुम सरगम से बहते
जताते नहीं , तुम हमसे मोहब्बत
लबों के तकल्लुफ, निगाहों से कहते।
ज़रा बहती उन हवाओं से कह दो
फूलों से कह दो फिज़ाओं से कह दो।
तरन्नुम की महफ़िल को, तुम भी सजा लो
ना कह पाने के उन, बहानो से कह दो।
क्यों शरमाये इतने तुम फ़िर रहे हो
मोहब्बत है गर तो क्यों डर रहे हो
जब कह दोगे तो फ़िर ऐसा लगेगा
अधूरे से चित्रों में रंग भर रहे हो।
तेरी कोशिशों का है कायल ज़माना
धीरे से तू मेरे पहलू में आना
अभी लिख रहा हूं अकेले अकेले
संग तेरे गाऊंगा फ़िर ये तराना।