एक कहानी एसी भी ...
हथेली पे लिखि लकिर पे गम का अधिकार हे तो क्या हुआ !!
एक हि लकिर चाहिए खुशी के लिए, जिस पे मेरी बहेन का नाम हो..
आंखों को भिगोये एसा कोइ गम हि नहीं हे
क्योकि,ये शरबती आँखो मे गम के लिए जगह हि नहीं हे ..
रिवायतो कि सियासत बहुत देखि होगी जहाँ मे
लेकिन ये तो खुद एक रिवायत हे इस जहाँ मे
रुहानियत कि बात सुनाउ या मजहब का एहसास
जो भी सुनो, याद रखो, हे नुरानि रुह मेरे पास
कइ जन्मो के बाद सागर मे किनारा दिखा हे मुझे
क्योकि जिंदगी मे मेरी बहेन का साथ मिला हे मुझे
फ़िर से वो पुरानी बाते आफ़्ताब और चाँद कि सुनो
आज तो लग रहा हे ,वो इश्क को मजहब बना के हि छोड़ेगे ..