Hindi Quote in Poem by महेश रौतेला

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#KAVYOTSAV -2

कविता:

मैं अभी-अभी कविता पढ़ने बैठा हूँ,
कविता मेरे घर के ऊपर पहाड़ी चोटी से निकलती,
बाँज, चीड़,बुरुश के पेड़ों से उलझती,
नीचे को आ रही है,
वह एकदम पगडण्डी सी दिख रही है,
कुछ लोग उसमें आ-जा रहे हैं,
घसियारियां लोकगीत गाती
खुशियों को पहाड़ों के बीच बहा रही हैं।
कविता कुछ बहक कर
नदी से मिलने जा रही है,
नदी का शुद्ध पानी पी,
वृक्षों की छाया में बैठी,
दूर चोटियों को देख रही है,
वह उलझन में है,
प्यार के लिए जगह बना रही है।
उसे आशंका भी है,
कहीं युद्ध न छिड़ जाय,
आतंकवादी हमला न हो जाय,
उसकी अन्तरात्मा ये सब नकारती है,
वह नदी को पार करती है,
जंगल में जाने का जोखिम उठाती है,
कविता को जंगली जानवर मार नहीं सकते हैं,
ऐसा विद्वानों ने कहा है,
यदि जानवरों से बची
तो लोगों के घर आ सकती है।
कभी-कभी देखता हूँ,
वह चोटी से उड़ान भरती है,
बिल्कुल हवाई जहाज की तरह
लोगों से ठसाठस भरी,
क्षितिजों को खोलती, पास में खड़ी हो जाती है।

* महेश रौतेला

Hindi Poem by महेश रौतेला : 111159993
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