अपनी सुबह को स्वयं देखना है,
चाहे हम हिमालय में हों,
चाहे गंगा में नहा लें,
चाहे तपस्या में लीन हों,
चाहे अमेरिका में हों
या यूरोप, एशिया, अफ्रीका में रहें।
चाहे भारत में "सत्यमेव जयते" कह रहे हों,
या "सर्वे भवन्तु सुखिन:" सोच रहे हों,
या "नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि" बोल रहे हों,
लेकिन हमें अपनी सुबह के लिए स्वयं जागना है।
- महेश रौतेला