हमारा महाविद्यालय अद्भुत था,
सहपाठी अद्वितीय थे,
वे जिन्हें मैं जानता था,
और जिन्हें नहीं जानता था,
सभी को कुछ कहने को मन होता है जैसे-
"चलो, फिर सीधे-सादे हो जाएं
बच्चों की तरह हँस लें
बूंद की भाँति टपक लें
एक सीधे रास्ते पर निकल लें।
ठंडी हवाओं को समेट
कुछ स्वयं रख लें,
कुछ तुम्हें दे दें,
एक ही शाल साथ-साथ ओढ़ लें।
चलो, कुछ आन्दोलन करें
कुछ स्वयं जागने के लिये
कुछ औरों को जगाने के लिये।
भले, भुले-भटके से
कहीं से तो शुरुआत की जाय
कि तुम्हारे कदमों में मेरे कदम हों
मेरे कदमों में तुम्हारे।
चलो, फिर से कुछ कहें
कुछ सहपाठियों के बारे में
कुछ अध्यापकों के बारे में
कुछ संस्थापकों के बारे में
कुछ पठन-पाठन के बारे में।
छेड़ें जिगर अपनी-अपनी
अपने लौटते-घूमते मन से
जो फूल बन, खिलखिलाने लगा है।
कुछ छूट तो नहीं रहा
महाविद्यालय के वसंत में
जैसे कदम,दृष्टि, अर्ध सत्य,
वर्षा, बर्फ,गुनगुनी धूप,आशा-आकांक्षा,
पेड़, पहाड़, नदी-नाले, झरने-झील,
चलो, फिर सीधे-सादे हो जाएं,
इन सबके साथ साथ।
**महेश रौतेला