कविताएं महकती रहेंगी,
पहाड़ी वृक्षों की तरह,
समुद्री जीवों की भाँति तैरती रहेंगी,
या चीते की तरह छलांग लगा सकती हैं,
पक्षियों की तरह उड़ने का प्रयास कर सकती हैं,
मनुष्य अच्छा रहेगा या बुरा रहेगा,
कविताएं लिखी जायेंगी।
दुनिया केवल प्यार से नहीं चलती है,
कर्म भी चाहिए उत्तम,
या कहें महाभारत सा कुछ बनता बिगड़ता है यहाँ,
हमारे अन्दर का मनुष्य जब तक मरा न हो,
कविता-कहानी महकती रहेंगी।
बांबियों से निकलता मनुष्य
गुफाओं से निकलता मनुष्य,
महलों से निकलता मनुष्य,
झोपड़ियों से निकलता मनुष्य,
सभी को महक कभी भी मिल सकती है।
***महेश रौतेला