मैं और मेरे अह्सास
इश्क की बंदगी
क्या क्या सवाल मेरी नजर पूछती रही l
ताउम्र हमेशा कसौटी लेती जिंदगी रही ll
छाया है इस दिल पर इश्क़ का एसा नशा l
रूह की सुकूनत में इश्क की बंदगी रही ll
आशिकी में मिलन का ही सिलसिला कि l
खामोशी से दिल की नगरी में बसी रही ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह