आज अचानक यूं ही बैठे ख़्याल आया
कब सुबह हो गई,अब साया गहरा छाया..
इक इक पल बदल जाता है,बरसों में..
कभी रास्ते लगते थे दूर
अब मंजिल का निशाँ गहराया..
पता ही नहीं लगा कि
कब बचपन ढल गया
जिम्मेवारियों का कब बोझ
सर चढ़ गया...
पर ये ही तो अलग अहसास है ' शिल्पी'
हंसते गाते जाने कब ये सफ़र गुज़र गया..!!
हमारी कलम से..
शिल्पी..
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