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वक़्त, ठहर जा ज़रा मन करता है, वक़्त को थाम लें, यूँ ही इस पल को अपने नाम कर लें। न गुज़रे ये पल, न बीते ये घड़ी, वक़्त, ठहर जा ज़रा, ज़िंदगी की इस ख़ूबसूरती को जीना है अभी। जिस तरह गुज़रकर अतीत से, हम वर्तमान में आ जाते हैं, काश! कुछ पल ऐसे भी हों, जहाँ हम वक़्त को थाम पाते।
हमारा बचपन बचपन के लम्हे वक़्त मिटा नहीं पाता है, गुज़रा हुआ हर दौर दिल में उतर जाता है। मासूम हँसी, वो शरारतों का ज़माना, दिल में महफ़ूज़ है बचपन का फ़साना। वक़्त की रफ़्तार में उम्र गुज़र जाती है, मगर बचपन की यादें कहाँ मिट पाती हैं। किसी नन्हे की हँसी में ख़ुद को पाते हैं, उसकी शरारतों में अपने दिन लौट आते हैं। उसका रोना, उसकी हँसी, उसकी नादानी, याद दिलाती है अपनी गुज़री ज़िंदगानी। उसकी मासूमियत में अपना अक्स नज़र आता है, दिल का ख़ामोश कोना फिर मुस्कुराता है। लगता है, जैसे वक़्त पल भर को ठहर जाता है, उस नन्हे के चेहरे में बचपन लौट आता है। बचपन फ़क़त गुज़रा हुआ एक दौर नहीं, इसकी यादों से दिल का कोई रिश्ता कमज़ोर नहीं। उम्र बढ़ती है, बदलता है ज़िंदगी का कारवाँ, मगर दिल में महफ़ूज़ रहता है बचपन का जहाँ। वो नटखट अदाएँ, वो मासूम नादानियाँ, यादों में आज भी ज़िंदा हैं बचपन की कहानियाँ।
मित्रता — जीवन का अनुभव मित्रता केवल एक शब्द नहीं, जीवन को सरल बनाने का एहसास है। अपने दुख, अपनी पीड़ा कहकर, मन को मिलता अनकहा सुकून है। मन के कोने में छिपी भावनाएँ, जब किसी अपने से बाँटते हैं, तो लगता है मानो अपने ही भीतर, हम कोई जंग जीत जाते हैं। अपनी अनगिनत बातें कहकर, जब किसी की बातें सुनते हैं, उसकी सलाह और अपनेपन से, मन के उलझे धागे सुलझते हैं। उस शांति को शब्दों में बाँधना, शायद इतना आसान नहीं, मित्रता-सा अनमोल एहसास, इस जीवन में उसका कोई सानी नहीं।
ग़म का फ़लसफ़ा ग़म में ग़म को भुलाया हमने, ग़म को ही ग़म बनाया हमने। ग़म की महफ़िल में ख़ामोश रहे, अपने ही दर्द से हम रूबरू रहे। ग़म को तस्लीम किया, ग़म से गिला न किया, दिल में तूफ़ान रहा, लबों से बयाँ न किया। ग़म की तफ़सीर में उम्र गुज़ारी हमने, हर ख़ुशी में भी ग़म की झलक पाई हमने। ग़म से भागे तो ग़म ने पुकारा हमें, ग़म को भुलाया तो ग़म ने सँवारा हमें। ग़म का फ़लसफ़ा भी अजीब पाया हमने, ग़म को समझते रहे, ख़ुद को भुलाया हमने।
दुख में दुख दुख में दुखी होकर, दुख के दुख को देखकर, दुख से और दुखी हुए हम। अपने ही दुख को दुख मानकर, दुख में ही ख़ुद को हारकर, अपने दुख से ख़ुद दुखी होकर, दुख के सागर में डूबे रहे हम। दुख को दुख से जोड़कर, दुख की ही राह पर चलकर, दुख में दुखी, दुख से परेशान, अपने ही दुख में उलझे रहे हम।
आशा है, निराशा है, अशांत है मन, आशा में छिपा है जीवन का स्पंदन। आशा अच्छी है, निराशा बुरी, पर मन की शांति है सबसे ज़रूरी। आशा में सपने हैं, निराशा में सवाल, शांत मन में मिलता है हर उलझन का हल।
एकांत के इस साये में, हर कोई बदला-सा लगता है, सब हैं मेरे आसपास, फिर भी कोई अपना-सा नहीं लगता। पास होकर भी सब दूर हैं, या दूरियों में हम ख़ुद खो गए? सब कुछ तो है इस ज़िंदगी में, फिर क्यों हम ख़ुद से ही दूर हो गए? मन के इस ख़ामोश कोने में, कुछ है जो अच्छा नहीं लगता, चेहरे पर सब ठीक है फिर भी, मन पहले-सा क्यों नहीं लगता? न जाने कहाँ खो गई वह मुस्कान, जो कभी हमें सबसे प्यारी थी, किस साये में गुम हुई वह, जो कभी हमारे जीवन की ख़ुशहाली थी? अब ख़ुद से ही सवाल है मेरा, यह कैसा एकांत है छाया? सब कुछ होकर भी कुछ नहीं लगता, क्या मैंने ख़ुद को खोया, या वक़्त ने मुझे मुझसे दूर बनाया?
काश! वो पल ठहर जाता वो पल, वो बातें, काश ठहर जातीं, काश! हम फिर वहीं ठहर जाते। काश! वक़्त कुछ पल के लिए रुक जाता, काश! हम उन लम्हों में फिर जी पाते। काश! वो पल कभी गुज़रा ही न होता, काश! तुम भी उस पल ठहर जाते।
अनकही कहानी समय अपनी गति से चलता रहा, हम भी उसके साथ चलते रहे। मन में भावनाओं का सागर था, हम ख़ामोशी से उसे सँभालते रहे। सबकी भावनाओं को समझा हमने, सबके मन की बात पढ़ते रहे। वे हमारे बारे में क्या सोचते हैं, इन्हीं सवालों में उलझते रहे। दूसरों को पहचानते-पहचानते, हम ख़ुद से ही अनजान हो गए। सबके दर्द को अपना समझते हुए, अपने ही दर्द से अनजान हो गए। हमने सुनी सबकी कहानी, हर दर्द को समझने की कोशिश की। जब अपनी बात कहने की बारी आई, तो किसी ने सुनने की ज़हमत न की। जिन्हें अपना समझकर मन खोला, जिनसे हर परेशानी साझा की, जब हमें भी किसी अपने की चाह हुई, तो ख़ामोशी ने ही हमसे बात की। अब कैसे पहचानें अपनों को, किसे अपना कहें, किसे पराया? जिनके लिए हम हमेशा खड़े रहे, उन्होंने ही हमें अनदेखा बनाया। धीरे-धीरे हमने कहना छोड़ दिया, मन की बातें मन में रखना सीख लिया। जो शब्द कभी होंठों तक आते थे, उन्हें ख़ामोशी में समेटना सीख लिया। पर आज भी मन में सवाल उठता है, क्यों कोई हमारी कहानी नहीं सुनता है? क्या दूसरों का दर्द ही दर्द होता है, क्या हमारा मन कुछ नहीं कहता है? न जाने कितनी बातें अधूरी हैं, न जाने कितने एहसास दबे हैं। चेहरे पर भले ही शांति दिखाई दे, मन में कितने अनकहे सवाल खड़े हैं। समय अपनी गति से चलता रहा, हम भी उसके साथ चलते रहे। सबकी कहानी सुनते-सुनते, अपनी कहानी ख़ुद से कहते रहे। यह कैसी अनकही कहानी है, जिसमें भावनाएँ तो बहुत हैं, पर सुनने वाला कोई नहीं। सबको समझने की कोशिश में ख़ुद को समझने वाला भी कोई नहीं।
भावनाओं से परे जीवन चाहा हमने, नदी की धारा के जैसा जीवन हो, उसमें समुंदर जैसी गहराई हो, वसंत ऋतु जैसी बहार हो, बारिश की बूँदों जैसी निश्चलता हो। पर क्यों ये भावनाएँ एक विशाल चट्टान की तरह हमें ख़ुद के भीतर समेट लेती हैं? क्यों इनके साये में हम ख़ुद से ही दूर हो जाते हैं? कभी डर है, कभी अकेलापन, कभी दुख है, कभी एकांत, कभी ऐसा लगता है जैसे खो गए हों हम कहीं, अपने ही जीवन के किसी अनजान मोड़ पर। नहीं चाहिए हमें एकांत का वह डर, जिसके साये में ख़ुद को ही खो दें हम। हमें उन सायों से बाहर निकलना है, अपने ही जीवन में ख़ुद को फिर से पाना है। जब जीवन को समझना चाहा, तो भावनाओं के अनेक रूप सामने आए। जिन एहसासों से डरते रहे हम, उनके अर्थ धीरे-धीरे समझ में आए। हर भावना को जाना हमने, हर एहसास को समझा हमने, तब जाना कि कई बार जिन भावनाओं से डरते रहे हम, उन्हीं के कारण ख़ुद से दूर होते गए हम। अब भावनाओं के साये में खोना नहीं, अपने ही जीवन से दूर होना नहीं। डर को समझकर उससे आगे बढ़ना है, एकांत के साये से निकलकर ख़ुद के साथ भी जीना सीखना है। जीवन को नदी की तरह बहने देना है, हर अनुभव को सहजता से सहने देना है। मन में शांति, आँखों में सपने सजाकर, अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ते जाना है। भावनाओं को समझकर, ख़ुद को पहचानना है, एकांत के डर से निकलकर खुलकर अपना जीवन जीना है।
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