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Chandni

Chandni

@somadevi947535


मेरी प्रेरणा

कौन है मेरी प्रेरणा?
जब भी मन यह प्रश्न उठाता है,
उत्तर एक नहीं,
पूरा मेरा परिवार बनकर सामने आ जाता है।

मेरी माँ मेरी पहली गुरु हैं,
मेरे पिताजी मेरे जीवन का संबल हैं।
मेरे भाऊजी का स्नेह,
मेरे जीवन की अमूल्य निधि है।

मेरे नाना-नानी, दादा-दादी,
ताऊ-ताई, चाचा-चाची,
मामा-मामी और मेरे भाई-बहन—
ये सभी मेरे जीवन की अमूल्य प्रेरणाएँ हैं।

इन्होंने मुझे चलना सिखाया,
गिरकर फिर संभलना सिखाया।
हँसना, मुस्कुराना,
मिल-जुलकर प्रेम से रहना सिखाया।

इनके संस्कारों ने मेरे व्यक्तित्व को गढ़ा,
इनके आशीर्वाद ने मेरे जीवन को सँवारा।
इनके स्नेह की छाया में
मैंने हर कठिन राह को सहज पाया।

मेरे नाना-नानी का स्नेह
मेरे जीवन की अनमोल धरोहर है।
उन्होंने मुझे केवल जीना ही नहीं,
बल्कि सच्चे संस्कारों के साथ जीवन जीना सिखाया।

मेरा परिवार निर्मल, स्वच्छ,
बहते हुए जल के समान पावन है।
जो हर पल अपने प्रेम, त्याग और आशीर्वाद से
मेरे जीवन को सींचता रहता है।

मैं ईश्वर का हृदय से धन्यवाद करती हूँ
कि मुझे ऐसा परिवार मिला।
यही मेरा साहस है,
यही मेरी शक्ति है,
और यही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा है।

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अंतर्मन का द्वंद्व

क्यों अपराधबोध से भर उठता है मेरा मन?
क्यों अपनी ही रचनाओं को पढ़ते हुए भावों से भर उठती हूँ मैं?
क्यों किसी की सहायता लेने में हिचकिचाती हूँ मैं?
क्यों कविता रचने की उत्कंठा मुझे बार-बार पुकारती है,
फिर भी मन किसी अनजाने भय से घिर जाता है?

क्यों अपनी छोटी-छोटी त्रुटियों को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाती?
क्यों लगता है कि यदि भाषा, व्याकरण, लय, तुक और प्रवाह को सँवारने में
किसी यंत्र का थोड़ा-सा सहयोग ले लूँ,
तो कहीं मेरा कवित्री बनने का स्वप्न अधूरा न रह जाए?

क्या सहायता लेना मेरी मौलिकता को कम कर देगा?
या मेरी अभिव्यक्ति को और अधिक स्पष्ट, सशक्त और प्रभावी बना देगा?

क्यों मेरी रचनाओं में अनायास ही पीड़ा उतर आती है?
क्यों प्रत्येक पंक्ति मेरे अंतर्मन का स्वर बन जाती है?
शायद इसलिए कि हर शब्द मेरे हृदय से जन्म लेता है,
और हर भाव मेरे जीवन के अनुभवों से आकार पाता है।

मैं जानती हूँ—
भाव मेरे हैं,
विचार मेरे हैं,
अनुभूतियाँ मेरी हैं।
यदि कोई केवल मेरी भाषा को सँवार दे,
मेरे शब्दों को अधिक सुसंगत, सहज और प्रभावशाली बना दे,
तो भी मेरी रचना की आत्मा मेरी ही रहेगी।

ठान लिया है अब मैंने—
पीछे नहीं हटूँगी रचना करने से।
अपने इस रचनात्मक सफ़र में
अपने मुकाम तक पहुँचकर रहूँगी।

आकाश की निर्मलता-सा स्वच्छ रखूँगी अपने विचारों को।
बादलों की ओट में नहीं,
सत्य के प्रकाश में डटकर खड़ी रहूँगी।
मेरी रचनाएँ भी निर्मल आकाश-सी
स्वच्छ, उजली और निष्कलुष होंगी।

नदी की अविरल धारा-सी
मेरी काव्य-यात्रा निरंतर बहती रहेगी।
हर मोड़ पर नए छंद,
नए शब्द और नए भाव जन्म लेते रहेंगे।

सागर की अथाह गहराइयों से
विचारों के अनमोल मोती चुनूँगी,
और उन्हें ऐसे शब्दों में पिरोऊँगी
जो पाठकों के हृदय को स्पर्श करें।

हर परिस्थिति मुझे कुछ न कुछ सिखाकर जाएगी,
जिससे मैं अपने जीवन में और बेहतर बन सकूँगी।

सदैव तत्पर रहूँगी
अपनी रचनाओं को गढ़ने और निखारने में।
कभी न डरूँगी,
कभी न रुकूँगी,


कभी अपने विश्वास को टूटने नहीं दूँगी।

अपने कवित्री बनने के स्वप्न को
अपने शब्दों, अपने भावों और अपने सतत प्रयासों से
एक दिन अवश्य साकार करूँगी।

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माँ – मेरे जीवन का प्रकाश

मेरी माँ हैं इस संसार की सबसे अनुपम,
उनके जैसा कोई नहीं इस सृष्टि में।
वे ही हैं मेरे जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा,
जिनसे मिली मुझे जीने की सच्ची साधना।

जीवन के हर कठिन मोड़ पर,
हर छोटे-बड़े संघर्ष के क्षण पर,
उन्होंने कभी मेरा साथ नहीं छोड़ा।
सदैव मेरा हाथ थामे रखा,
हर संकट से मुझे बचाया।

वे ही मेरी शक्ति हैं,
वे ही मेरी हिम्मत हैं।
उनसे बढ़कर इस संसार में
मेरा कोई अपना नहीं।

उनसे ही मेरी अच्छाई है,
उनसे ही मेरी सच्चाई है।
वे नहीं, तो मैं भी नहीं।
उन्होंने अपने त्याग, तप और प्रेम से
मेरा भविष्य उज्ज्वल बनाया।

उन्होंने मुझे सिखाया—
समय का मूल्य क्या होता है,
संघर्षों से लड़ना क्या होता है,
और अभावों को भी
अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाना क्या होता है।

हे मेरी प्यारी माँ!
आपका स्नेह अथाह है,
आपका प्रेम निष्कलंक है।
आप सबका ध्यान रखती हैं,
सबके लिए दुआएँ माँगती हैं,
और अपने वात्सल्य की छाया
सदैव हम सब पर बनाए रखती हैं।

मैं नमन करती हूँ अपनी माँ को,
जिनके चरणों में मेरा समस्त सम्मान है।
यदि इस जीवन में मुझे कुछ भी अच्छा मिला है,
तो वह आपकी ही सीख,
आपके ही संस्कार,
और आपके ही आशीर्वाद का परिणाम है।

हे माँ!
आप मेरे जीवन का प्रकाश हैं,
मेरी पहली गुरु हैं,
मेरी सबसे बड़ी शक्ति हैं।
आपके चरणों में मेरा
कोटि-कोटि प्रणाम।

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