यह जो गहरा सन्नाटा है,
मुझसे कुछ कहने आता है।
दिन भर तो बहल गया यह दिल,
रात होते ही क्यों घबराता है?
तारों की महफ़िल जलती है,
रोशनी दूर कहीं ढलती है।
अंधेरे में छुपकर रोने की,
पुरानी आदत अब चलती है।
ख्वाब जो देखे थे आँखों ने,
कांच से बनकर टूट गए।
हम वहीं खड़े हैं तनहा से,
हमसफर जो राहों में छूट गए।