भीड़ में भी एक अकेलापन साथ चलता है,
जब दिल का कोई कोना चुपचाप जलता है।
मुस्कुराते हैं चेहरे पर मुखौटा लगा कर हम,
अंदर ही अंदर न जाने कितना कुछ ढलता है।
कुछ अनकहे शब्द थे, जो होठों पर ही जम गए,
जो कभी अपने थे, रास्तों में कहीं थम गए।
वक्त तो गुज़र गया अपनी रफ्तार से,
पर हम वहीं किसी पुरानी याद में थम गए।
ना कोई शिकायत है अब, ना कोई गिला है,
ज़िंदगी से जो मिला, वही हमारा सिला है।
काँच की तरह टूट कर भी बिखरते नहीं हम,
बस हर रोज़ थोड़ा और खामोश होते जाते हैं हम।
- Ritu kumari