माँ...अम्बे की पदयात्रा
भाद्रमास की यह पदयात्रा
भक्तों का यह विराट प्रवाह ,
माँ अम्बे की पावन चरणों में
अंबाजी की ओर चलता रहा ।
हर एक भक्त का शुद्ध मन
अरावली के कठिन पथ पर ,
गब्बर की ऊँची छाँव तले
लाखों पाँव स्वयं बढ़ते रहे ।
जहा माँ ने मन से पुकारा
वहा भक्त खिंचा चला आया ,
निरंतर चलता रहा श्रद्धालु
पैरों में छालों की तीव्र पीड़ा ।
मुख पर सदैव माँ का नाम
तन बेशक थककर चूर हुआ ,
पर मन कभी हार न मानें
आँखों में बस एक ही सपना ।
दिल में बस दर्शन की प्यास
बाहर विकट परिस्थिति में भी ,
जाग रहा भीतर दृढ़ विश्वास
हाथों में पवित्र ध्वजा थामें ।
लाल चुनर माथे पर बाँधे
जुबां पर अटूट श्रद्धा से ,
' बोल मारी अम्बे, जय..जय..अम्बे ' का
मधुर सूर सर्वत्र गूँज उठा ।
झुंड के झुंड आगे बढ़ते रहे
बूढ़े-बच्चे और जवान
भूलकर अपना होश, ज्ञान ,
सब रथ के संग नाच रहे ।
सब संघ के साथ चल रहे
पथ-पथ पर आगे-पीछे ,
परस्पर मिल-जुलकर
एकता का स्नेह बाँटकर ।
जगह-जगह पर लगें हैं
निःशुल्क सेवा शिविर ,
पग-पग पर भोजन, विश्राम
कोई दबाता पाँव थके ।
कोई लगाता ज़ख्म पर मरहम
कोई आराम में ले माँ का नाम ,
निराली है मांँ तेरी यह लीला
सब भक्तजन तेरा स्मरण करें।
निस्वार्थ भाव की बहती गंगा
भक्त तेरी करुणा का आधार ,
अरासुरी के इस पावन स्थल पर
तेरा दिव्य और भव्य दर्शन पाने ।
सदैव निर्मल हृदय से
अनन्य भक्त की दृष्टि पड़ी ,
तेरे अनंत धाम पर
सारा कष्ट क्षणभर में मिटे ।
माँ..अम्बे के चरणों में
शीश झुककर धन्य हुआ ,
पुर्ण हुई असीम कृपा से
उसकी हर मनोकामना ।
शक्तिपीठ का यह महाकुंभ
भक्ती का यह अद्भुत संगम ,
श्रद्धा की अविरल धार
पा ले तू जीवन की नैया पार ।
©®- शेखर खराड़ी
तिथि-२४/९/२०२६