🍁' दर्द-ए-तन्हाई '🍁
तेरे नहीं होने का मुझे बेहद ग़म है।
महफ़िल में भी आँखें रहती नम है।
खिला इक गुलाब अब मुरझा गया,
वैसे चारों तरफ़ बिखरी शबनम है।
जी रहे हैं बस तुम्हारी यादों के सहारे ,
मयख़ाने में भी शराब बहुत कम है।
खुश था बहुत मैं, जब तुम संग थे मेरे,
कैसे रहूँ मैं खुश, जब दूर मेरा सनम है।
ज़ख्म-ए-दिल छुपाए बैठे महफ़िल में,
बस एक तेरी कमी दिल में हरदम है।
वक्त गुज़रता है पर दर्द नहीं जाता,
तेरी याद के सिवा ना कोई मरहम है।
धड़कनें भी अब रुक-रुक के चलती हैं,
इस सीने में अब तो अटका मेरा दम है।
दर्द-ए-दिल अब सहा नहीं जाता 'व्योम',
जुदाई के अलावा न कोई बड़ा सितम है।
✍...© विनोद. मो. सोलंकी " व्योम "
जेटको (GEB) अंजार. मु. रापर.