🌸हुआ इश्क़ भी है🌸
हुआ इश्क़ भी है, और कोई नाम भी नहीं,
सामने हो तुम, मगर दिल को आराम भी नहीं।
जो था अजनबी, वो अब हमसफ़र हो गया है,
कैसा ये सफ़र है,धूप तो बहुत है, मगर शाम भी नहीं।
गुस्ताख़ियाँ करता है दिल, नादान भी है बेचारा,
चढ़ती शराब-सा है, मगर हाथ में जाम भी नहीं।
हुस्न का दीवाना कब था मैं, तुम मिले तो रूबरू हुआ,
बूँद-बूँद तुझमें बह जाना था, और कोई अरमान भी नहीं।
ख़ुद को रोक लेती हो, मुझे भी सबक देती हो,
आग़ोश में आती तो हो,फिर दर्द से अनजान भी नहीं।
बरसों बीते, मुद्दतों बाद यूँ मिले हैं हम,
पास तो हैं मगर, दिलों के बीच कोई पैग़ाम भी नहीं।
कभी आँखों से बातें थीं, कभी ख़ामोशी में इकरार था,
अब लबों पर मोहब्बत है, मगर वो पहले-सा उफ़ान भी नहीं।
अजीब रिश्ता है अपना, न मुकम्मल, न अधूरा,
तुम मेरी ज़िंदगी हो,मगर मेरा कोई अंजाम भी नहीं।
जिस्म करीब हैं, साँसें भी एक-दूसरे को छूती हैं,
मगर रूह तक पहुँचने का कोई इल्ज़ाम भी नहीं।
हुआ इश्क़ भी है, और कोई नाम भी नहीं,
तुम मेरे सामने हो, मगर दिल को आराम भी नहीं।
✍️बेनी सागर